दूध में मिलावट की चरण सीमा

 

सरकार ने दिल को दहला देने वाला खुलासा किया कि देश में लोगों को उपलब्ध 68 फीसदी से ज्यादा दूध शुद्ध नहीं होता। उसमें डिटर्जेंट से लेकर रिफाइंड तेल और कास्टिक सोडा तक की मिलावट रहती है। यह समस्या इतनी गंभीर है, इसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा हो। इसकी रोशनी में जब ध्यान में आता है कि दूध शिशुओं और बढ़ रहे बच्चों तक का सर्व-प्रमुख आहार है, तो मन बेचैन हो उठता है। आखिर हम कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? सफेद रंग (पेंट), यूरिया और डिटर्जेंट (कपड़ा धोने का पाउडर) मिले दूध को पीकर बड़े हुए बच्चों का शारीरिक गठन कैसा होगा? उनकी कैसी सेहत की अपेक्षा की जा सकती है?
दरअसल, ऐसा दूध खुद ही कई बीमारियों का कारण बन सकता है। विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री हर्षवर्धन की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस भयानक सच के बारे में लोकसभा में बेबाक बयानी की। बताया कि 28 राज्यों और पांच केंद्रशासित प्रदेशों में भारतीय खाद्य संरक्षा व मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने साल 2011 में एक सर्वेक्षण किया। 1,791 सैंपल इकट्ठे किए गए। उनमें लगभग 70 फीसदी नमूने एफएसएसएआई के मानकों पर खरे नहीं थे। बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, झारखंड और दमन-दीव में हाल कुछ ज्यादा ही बुरा था।
इस तथ्य को जानने के बाद शायद ही कोई भारतीय इस पर गर्व करे कि अपना देश दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है। स्वास्थ्यवर्धक होना तो दूर, आमजन को उपलब्ध दूध जब सेहत के लिए असुरक्षित है, तो उसका चाहे जितनी मात्रा में उत्पादन हो, वह चिंता का विषय ही रहेगा। इसलिए ऐसे आंकड़े फिलहाल निरर्थक लगते हैं कि पिछले साल देश में दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दर 2.2 फीसदी थी।
वैसे इस चिंताजनक सूरत के बीच केंद्रीय मंत्री द्वारा दी गई यह जानकारी जरूर उम्मीद की किरण है कि दूध में मिलावट का पता लगाने के लिए एक नई मशीन बनाई गई है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (सीईईआरआई) ने मिलकर इसे बनाया है। इससे दूध के नमूने को जांचने की लागत करीब पांच से 10 पैसे मात्र आएगी। यह काम 40-45 सेकंड में पूरा हो जाएगा।
सभी सांसदों को हर्षवर्धन की इस अपील पर ध्यान देना चाहिए कि वे अपनी सांसद निधि से अपने संसदीय क्षेत्र में यह स्कैनर लगवाएं। राज्य सरकारों को हर गली-मोहल्ले तक यह मशीन लगवाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। नागरिकों खासकर बच्चों एवं नौजवानों की अच्छी सेहत सुनिश्चित करना उनका दायित्व है। हर्षवर्धन ने बताया कि आगे जीपीएस आधारित ऐसी तकनीक भी विकसित की जाएगी, जिससे पता लगेगा कि सप्लाई के दौरान किस स्तर पर दूध में मिलावट की गई। ऐसी मशीनों को जल्द-से-जल्द व्यापक उपयोग में लाया जाना चाहिए। जब लोग स्वार्थ में अंधे होकर दूसरों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं, तो आशा सिर्फ नई तकनीक से ही जोड़ी जा सकती

सरकार ने दिल को दहला देने वाला खुलासा किया कि देश में लोगों को उपलब्ध 68 फीसदी से ज्यादा दूध शुद्ध नहीं होता। उसमें डिटर्जेंट से लेकर रिफाइंड तेल और कास्टिक सोडा तक की मिलावट रहती है। यह समस्या इतनी गंभीर है, इसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा हो। इसकी रोशनी में जब ध्यान में आता है कि दूध शिशुओं और बढ़ रहे बच्चों तक का सर्व-प्रमुख आहार है, तो मन बेचैन हो उठता है। आखिर हम कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? सफेद रंग (पेंट), यूरिया और डिटर्जेंट (कपड़ा धोने का पाउडर) मिले दूध को पीकर बड़े हुए बच्चों का शारीरिक गठन कैसा होगा? उनकी कैसी सेहत की अपेक्षा की जा सकती है?
दरअसल, ऐसा दूध खुद ही कई बीमारियों का कारण बन सकता है। विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री हर्षवर्धन की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस भयानक सच के बारे में लोकसभा में बेबाक बयानी की। बताया कि 28 राज्यों और पांच केंद्रशासित प्रदेशों में भारतीय खाद्य संरक्षा व मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने साल 2011 में एक सर्वेक्षण किया। 1,791 सैंपल इकट्ठे किए गए। उनमें लगभग 70 फीसदी नमूने एफएसएसएआई के मानकों पर खरे नहीं थे। बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, झारखंड और दमन-दीव में हाल कुछ ज्यादा ही बुरा था।
इस तथ्य को जानने के बाद शायद ही कोई भारतीय इस पर गर्व करे कि अपना देश दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है। स्वास्थ्यवर्धक होना तो दूर, आमजन को उपलब्ध दूध जब सेहत के लिए असुरक्षित है, तो उसका चाहे जितनी मात्रा में उत्पादन हो, वह चिंता का विषय ही रहेगा। इसलिए ऐसे आंकड़े फिलहाल निरर्थक लगते हैं कि पिछले साल देश में दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दर 2.2 फीसदी थी।
वैसे इस चिंताजनक सूरत के बीच केंद्रीय मंत्री द्वारा दी गई यह जानकारी जरूर उम्मीद की किरण है कि दूध में मिलावट का पता लगाने के लिए एक नई मशीन बनाई गई है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (सीईईआरआई) ने मिलकर इसे बनाया है। इससे दूध के नमूने को जांचने की लागत करीब पांच से 10 पैसे मात्र आएगी। यह काम 40-45 सेकंड में पूरा हो जाएगा।
सभी सांसदों को हर्षवर्धन की इस अपील पर ध्यान देना चाहिए कि वे अपनी सांसद निधि से अपने संसदीय क्षेत्र में यह स्कैनर लगवाएं। राज्य सरकारों को हर गली-मोहल्ले तक यह मशीन लगवाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। नागरिकों खासकर बच्चों एवं नौजवानों की अच्छी सेहत सुनिश्चित करना उनका दायित्व है। हर्षवर्धन ने बताया कि आगे जीपीएस आधारित ऐसी तकनीक भी विकसित की जाएगी, जिससे पता लगेगा कि सप्लाई के दौरान किस स्तर पर दूध में मिलावट की गई। ऐसी मशीनों को जल्द-से-जल्द व्यापक उपयोग में लाया जाना चाहिए। जब लोग स्वार्थ में अंधे होकर दूसरों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं, तो आशा सिर्फ नई तकनीक से ही जोड़ी जा सकती है।
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दरअसल, ऐसा दूध खुद ही कई बीमारियों का कारण बन सकता है। विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री हर्षवर्धन की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस भयानक सच के बारे में लोकसभा में बेबाक बयानी की। बताया कि 28 राज्यों और पांच केंद्रशासित प्रदेशों में भारतीय खाद्य संरक्षा व मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने साल 2011 में एक सर्वेक्षण किया। 1,791 सैंपल इकट्ठे किए गए। उनमें लगभग 70 फीसदी नमूने एफएसएसएआई के मानकों पर खरे नहीं थे। बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, झारखंड और दमन-दीव में हाल कुछ ज्यादा ही बुरा था।
इस तथ्य को जानने के बाद शायद ही कोई भारतीय इस पर गर्व करे कि अपना देश दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है। स्वास्थ्यवर्धक होना तो दूर, आमजन को उपलब्ध दूध जब सेहत के लिए असुरक्षित है, तो उसका चाहे जितनी मात्रा में उत्पादन हो, वह चिंता का विषय ही रहेगा। इसलिए ऐसे आंकड़े फिलहाल निरर्थक लगते हैं कि पिछले साल देश में दूध का उत्पादन 6.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दर 2.2 फीसदी थी।
वैसे इस चिंताजनक सूरत के बीच केंद्रीय मंत्री द्वारा दी गई यह जानकारी जरूर उम्मीद की किरण है कि दूध में मिलावट का पता लगाने के लिए एक नई मशीन बनाई गई है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (सीईईआरआई) ने मिलकर इसे बनाया है। इससे दूध के नमूने को जांचने की लागत करीब पांच से 10 पैसे मात्र आएगी। यह काम 40-45 सेकंड में पूरा हो जाएगा।
सभी सांसदों को हर्षवर्धन की इस अपील पर ध्यान देना चाहिए कि वे अपनी सांसद निधि से अपने संसदीय क्षेत्र में यह स्कैनर लगवाएं। राज्य सरकारों को हर गली-मोहल्ले तक यह मशीन लगवाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। नागरिकों खासकर बच्चों एवं नौजवानों की अच्छी सेहत सुनिश्चित करना उनका दायित्व है। हर्षवर्धन ने बताया कि आगे जीपीएस आधारित ऐसी तकनीक भी विकसित की जाएगी, जिससे पता लगेगा कि सप्लाई के दौरान किस स्तर पर दूध में मिलावट की गई। ऐसी मशीनों को जल्द-से-जल्द व्यापक उपयोग में लाया जाना चाहिए। जब लोग स्वार्थ में अंधे होकर दूसरों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं, तो आशा सिर्फ नई तकनीक से ही जोड़ी जा सकती है।
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